पहाडो क़े ब़ीच मे था एक गाँव बसा,
उसी गाँव के छोर पे था घर मेरा,
मैं और मेरे घर का आंगन,
उस आंगन में मेरा बचपन बड़ा हुआ,
उस आगन की दुनिया बड़ी खूबसूरत थी,
उसकी मिट्टी में जाने वो कैसी खुस्बू थी,
उन पेड़ो की छाया आज याद आती है,
उन पेड़ो की हवा बहुत ठंडी थी,
मैं उस दुनिया का रहने वाला था,
जो दुनिया सारे दुखों से अनजान थी,
फिर एक दिन ना जाने, वो गलियाँ मैं छोड़ आया,
आपनो से दूर इस भीड़ भरी मेहफिल मे चला आया,
किसका डर है, ये कैसी बेड़ियाँ पाओं में हैं!
डरता हूँ शायद खुद से, अपने पड़ोसियों से,
इस शोर मचाती दुनिया से और आने वाले कल से!
क्यूं इतना मजबूर हो गया हूँ,
क्यूं अपनी जड़ों से दूर हो गया हूँ,
ये कैसा सवाल बार-बार जेहन में आता है,
ये कैसा दर्द है जो अंदर ही अंदर रुलाता हैं!
जितेन्द्र!
उसी गाँव के छोर पे था घर मेरा,
मैं और मेरे घर का आंगन,
उस आंगन में मेरा बचपन बड़ा हुआ,
उस आगन की दुनिया बड़ी खूबसूरत थी,
उसकी मिट्टी में जाने वो कैसी खुस्बू थी,
उन पेड़ो की छाया आज याद आती है,
उन पेड़ो की हवा बहुत ठंडी थी,
मैं उस दुनिया का रहने वाला था,
जो दुनिया सारे दुखों से अनजान थी,
फिर एक दिन ना जाने, वो गलियाँ मैं छोड़ आया,
आपनो से दूर इस भीड़ भरी मेहफिल मे चला आया,
किसका डर है, ये कैसी बेड़ियाँ पाओं में हैं!
डरता हूँ शायद खुद से, अपने पड़ोसियों से,
इस शोर मचाती दुनिया से और आने वाले कल से!
क्यूं इतना मजबूर हो गया हूँ,
क्यूं अपनी जड़ों से दूर हो गया हूँ,
ये कैसा सवाल बार-बार जेहन में आता है,
ये कैसा दर्द है जो अंदर ही अंदर रुलाता हैं!
जितेन्द्र!
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